Saturday, 7 March 2026

कितने काँटे कितने कंकर...



कितने   काँटे   कितने  कंकर  हो   गये

हर   गली   जैसे   सुख़नवर   हो   गये

 

रास्तों   पर    तीरगी   है   आज   भी

शह्र-से  जब  गाँव   के   घर   हो  गये

 

आत्मनिर्भर   होने  को   ही  थे  कि  वे

हुक्म   आया  घर  से   बेघर  हो   गये

 

जो  गिरी  तो  साख  गिरती   ही  गई

अच्छे   खासे   नोट  चिल्लर   हो  गये

 

सहमी-सहमी हर कली खिलती है अब

यूँ   बड़े   भँवरों  के  लश्कर   हो   गये

 

एक   नेता  और   अफसर   क्या   हुए

कितने-कितने   खेत   बंजर   हो    गए

 

डोर    ऐसी   उसके   हाथों   आ   गयी

उड़ते   पंछी   पल  में   बे-पर   हो  गये

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अशोक रक्ताले फणीन्द्र