जिस्म जो ढल ये जाएगा तो चल देंगे
वक्त जब पास आएगा तो चल देंगे
चल रही है अभी तो जंग ग़ैरों से
अपना भी जो सताएगा तो चल देंगे
हाल इतना बुरा भी है नहीं के हम
हाथ कोई हिलाएगा तो चल देंगे
काम बाक़ी हैं कितने ही अभी करना
बोझ माथे से जाएगा तो चल देंगे
अपने ही क़ैदखानों में हैं जकड़े हम
कोई आकर छुड़ाएगा तो चल देंगे
इश्क़ ने चोट जो इस बार दी ऐसी
चोट फिर वो लगाएगा तो चल देंगे
हैं ‘भगत’ हम अकेले कारवाँ में भी
ग़म ये भी जो सताएगा तो चल देंगे
~ अशोक रक्ताले ‘फणीन्द्र’