Thursday, 26 March 2026

जिस्म जो ढल ये जाएगा तो चल देंगे

 


जिस्म जो ढल ये जाएगा तो चल देंगे

वक्त  जब  पास  आएगा तो  चल देंगे

 

चल  रही  है  अभी  तो जंग  ग़ैरों  से

अपना भी  जो  सताएगा तो चल देंगे

 

हाल  इतना  बुरा भी  है  नहीं के हम

हाथ  कोई  हिलाएगा  तो  चल   देंगे

 

काम बाक़ी  हैं कितने ही अभी करना

बोझ  माथे  से   जाएगा तो  चल देंगे

 

अपने  ही  क़ैदखानों में  हैं  जकड़े हम

कोई  आकर  छुड़ाएगा  तो  चल  देंगे

 

इश्क़  ने  चोट  जो  इस बार दी ऐसी

चोट फिर वो  लगाएगा  तो चल देंगे 

 

हैं ‘भगत’ हम   अकेले  कारवाँ  में भी   

ग़म ये भी जो  सताएगा  तो चल देंगे

 

~ अशोक रक्ताले ‘फणीन्द्र’

जब भी देखूँ मुझको लगता कितना प्यारा है

 जब भी देखूँ मुझको लगता कितना प्यारा है

मेरे  घर  जो  दीवारों  पर  नाम  तुम्हारा है

 

तुमको देखे  फिर-फिर देखे जब  भी जी चाहे 

देख  तुम्हें  बन  बैठा ये  दिल  भी  आवारा है

 

उल्फ़त की  नौका  में बैठा  तब  ही यह जाना

कहते हैं  मँझधार  जिसे वह  एक  किनारा है

 

कान लगे रहते  हैं  सुनने  को  उसकी  आहट

वो  जो  नन्हा  पंछी  इन  आँखों  का तारा है

 

लग जाती है जब ठोकर तो गिर भी जाता हूँ

ढलते  वय  में  कोई  भी तो   शेष न चारा है

 

मिल जाएँ जो खुशियाँ उतनी जितने ग़म झेले

धड़क रहा बस  सोच यही दिल  भी बेचारा है

 

काम  नहीं  आएगी  दौलत  पाप  छिपाने  में

संतों  की  वाणी  में  इसका  साफ़  इशारा  है 

#

~ अशोक रक्ताले ‘फणीन्द्र’

Saturday, 7 March 2026

कितने काँटे कितने कंकर...



कितने   काँटे   कितने  कंकर  हो   गये

हर   गली   जैसे   सुख़नवर   हो   गये

 

रास्तों   पर    तीरगी   है   आज   भी

शह्र-से  जब  गाँव   के   घर   हो  गये

 

आत्मनिर्भर   होने  को   ही  थे  कि  वे

हुक्म   आया  घर  से   बेघर  हो   गये

 

जो  गिरी  तो  साख  गिरती   ही  गई

अच्छे   खासे   नोट  चिल्लर   हो  गये

 

सहमी-सहमी हर कली खिलती है अब

यूँ   बड़े   भँवरों  के  लश्कर   हो   गये

 

एक   नेता  और   अफसर   क्या   हुए

कितने-कितने   खेत   बंजर   हो    गए

 

डोर    ऐसी   उसके   हाथों   आ   गयी

उड़ते   पंछी   पल  में   बे-पर   हो  गये

#

अशोक रक्ताले फणीन्द्र

 

 


Saturday, 2 July 2016

खूँ हो गया सफ़ेद कोई जैसे मर गया



खूँ हो गया सफ़ेद कोई जैसे मर गया
रिश्तों से रंग प्यार का ऐसे उतर गया

कोई कमी न थी न कोई चाह थी मगर
बदला उधर जो दौर इधर घर बिखर गया

कोई न साथ चल सका दिन चार भी यहाँ
कोई इधर चला गया कोई उधर गया

महबूब भी मिला था मुझे एक फ्रिकमंद
तनहा जमीं पे छोड़ वही हमसफ़र गया  

यादों के कारवां ही फ़कत साथ रह गए
मुझसे हकीकतों का तो मन ही भर गया

है जिंदगी उदास मेरी भूख मिट गई
खुशियाँ न पा सका न ही गम छोड़कर गया

आँखों में रह गई नमी गम जब्त कर लिए
नदिया ठहर गई एक दरिया ठहर गया.

~ अशोक कुमार रक्ताले.

हमने यहीं पर ये चलन देखा



हमने यहीं पर ये चलन देखा

हर गैर में इक अपनापन देखा



देखी नुमाइश जिस्म की फिरभी

जूतों से नर का आकलन देखा



हर फूल ने खुश्बू गजब पायी

महका हुआ सारा  चमन देखा



लिक्खा मनाही था मगर हमने

हर फूल छूकर आदतन देखा



उस दम ठगे से रह गए हम यूँ  

फूलों को भँवरों में मगन देखा



होती है रुपियों से खनक कैसे

हमने भी रुक-रुक के वो फन देखा



रोशन चिरागों के तले देखे  

गलता हुआ बेबस बदन देखा 

~ अशोक कुमार रक्ताले.