जब भी देखूँ मुझको लगता कितना प्यारा है
मेरे घर जो दीवारों पर नाम तुम्हारा है
तुमको देखे फिर-फिर देखे जब भी जी चाहे
देख तुम्हें बन बैठा ये दिल भी आवारा है
उल्फ़त की नौका में बैठा तब ही यह जाना
कहते हैं मँझधार जिसे वह एक किनारा है
कान लगे रहते हैं सुनने को उसकी आहट
वो जो नन्हा पंछी इन आँखों का तारा है
लग जाती है जब ठोकर तो गिर भी जाता हूँ
ढलते वय में कोई भी तो शेष न चारा है
मिल जाएँ जो खुशियाँ उतनी जितने ग़म झेले
धड़क रहा बस सोच यही दिल भी बेचारा है
काम नहीं आएगी दौलत पाप छिपाने में
संतों की वाणी में इसका साफ़ इशारा है
#
~ अशोक रक्ताले ‘फणीन्द्र’
No comments:
Post a Comment